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kavita

कविता 


जी नहीं मैं कोई कविता कहने नहीं जा रहा हूँ । बल्कि कविता एक लड़की का नाम है , जो मेरे जेहन में कहीं बहुत अंदर परतों के नीचे दबी हुई है, शायद उसे मेरा नाम भी याद न हो , लेकिन क्या फ़र्क़ पड़ता है , हम लड़को ने कब इस बात की फिक्र की है।

मेरी कहानी उन लड़को की कहानी है , जिन्हे लड़कियां तो पसंद आ जाती हैं , पर या तो लड़कियों को वो पसंद नहीं आते ,या फिर कभी अपने दिल की बात कह नहीं पाते । 

भाग १

साल:2000
स्कूल : केंद्रीय विद्यालय  जोरहट, असम

मुझे याद है , जब पापा ने मुझे बोला की हम अब केन्द्रीय विद्यालय अम्बाला से ट्रांसफर ले के असम जा रहे हैं , मैं बहुत नाराज हुआ था, बहुत गुस्सा भी हुआ था । बालमन कभी समझ नहीं पाया की इसमें पापा का कोई दोष नहीं है , आर्मी में पोस्टिंग किसी के हाथ नहीं होती !

मैं बहुत ही भारी मन से अम्बाला से अपना नाम कटा के असम के लिए घर वालो के साथ निकला , एक ऐसी जगह , जिसके बारे में हमेशा गलत ही सुना , जिससे भी बताया  उसने कहा की बड़ी ख़राब जगह जा रहे हो । 
मन बैठ जाता था सुन सुन के।

खैर वो दिन भी आ गया जब मैंने जोरहट में कदम रखा , पीले पीले आर्मी क्वार्टर्स जो की काफी पुराने लग रहे थे देख के ही मन गिर गया । 
अम्बाला के क्वार्टर काफी खुले और अछे थे , उसके मुकाबले ये काफी छोटे और पुराने लग रहे थे ।

एक गोलाकार मैदान को चारो तरफ से घेरे  क्वार्टर्स  बने थे , जहां हम जैसे न जाने कितने बच्चे हिन्दुस्तान के सबसे सुदूर कोने में रह रहे थे । 
३,४ दिन हम चारो भाई बहनो के लिए बहुत ही बुरे निकले , न तो हमें यहां अच्छा लग रहा था , न ही हमारी किसी से दोस्ती हुई थी । 
ऊपर से यहां का मौसम , जहां  हर रोज  बारिश हो जाती थी और शाम जल्दी हो जाती थी।

आज जब पीछे मुड़ के देखता हूँ तो ऐसा लगता है की असम से ज्यादा खूबसूरत हिस्सा मेरी जिंदगी में कभी आया ही नहीं
  
हमारा  एडमिशन केंद्रीय विद्यालय जोरहाट  में करा दिया । हरे भरे पेड़ो और झाड़ियो से घिरा हुआ था मेरा छोटा  सा स्कूल।  
बरसात से बचने के लिए ऊपर छत की जगह टीन  थी, तकी पानी ठहर न सके , क्लास रूम छोटे थे और थोड़ी थोड़ी दूर पे आयताकार  आकर में बनाए गए थे , जैसे की क्लास  सातवी और आठवी साथ में ,और उनके ठीक सामने नवी और दसवी , और इन दोनों के बीच में एक छोटा  सा पथरीला मैदान , यहां एक बहुत  पुराना आम का पेड़  था ,पुरे समय पेड़ के आसपास किसी न किसी क्लास के बच्चे खेलते रहते थे   ऐसा लगता  था की मानो हमें अपनी छाया में खेलता देख वो भी खुश हो जाता था ।

हर क्लास के पीछे जंगली झाड़ियो के बड़े बड़े मैदान थे , जो निरंतर होती बारिश की वजह से हमेशा ही हरे भरे रहते ।इन्ही झाड़ियो को थोड़ा साफ़ सूफ कर के कबड्डी और खोखो खेलने की वव्यस्था की हुई थी 

हम सब बहुत खुश थे अब यहां ,  एक साल  हो गया था , और अब मैं आठवीं क्लास में आ गया था।

मेरी क्लास के पीछे भी छोटा सा ऊबड़ खाबड़ मैदान था , ऐसा कह जाता था की नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के साथ  यहां पर अंग्रेजो से लड़ाई की थी ।
बात सच थी या नहीं,  मैंने कभी जानने की कोशिश नहीं की , मेरी दिलचस्पी उस उबड़ खाबड़ मैदान में मिलने वाले पुराने सिक्को और गोलिओ के खोल से थी । उन्हें ढूढ़ना मेरा प्रिय  कार्य था।

क्लास के दांयी  हाथ में गर्ल्स वाशरूम था , वाशरूम और क्लास के बीचे में एक बड़े कमरे के आकर की  समतल जमीन थी , जहाँ एक अमरुद का पेड़ जवान हो रह था , जब क्लास में टीचर न होते , या उनके आने में देर होती तो हम सब धीरे से क्लास से निकल के यहां  चुप चाप कंचे या चुंगी खेलने जाते ।

 एक आध  टीचर को छोड़ के हम किसी से डरते नहीं थे , या यूं कहे की हमें मर काम पड़ती थे तो हम थोड़ा ढीठ  हो गए थे।

भाग २ 

 ऐसे ही दिन   निकले जा रहे थे जब मैंने उसे पहली बार उसे देखा , मुझे नहीं याद की वो साल का  कौन सा महीना था ।
कद माध्यम ,  ब्लू स्वेटर पहने , रंग  हल्का सांवला जो उसे देसी  टच  दे रह था ,हल्का रूखा चेहरा , मध्यम आकार की हलकी भूरी आँखे , हलके भूरे बाल जो सलीके से हैडबैंड द्वारा पीछे की तरफ करीने  से लगे हुए थे , ब्लू स्कर्ट , सफ़ेद जुराबे, काळा जूते पहने हुए शायद किसी को  ढूंढ रही थी ।
किस को ?
शायद मेरे क्लास टीचर को।

और मैं , क्लास रूम और वाशरूम के बीच के छोटे से उस जमीन के टुकड़े में , उस नवजवान होते अमरुद के पेड़ के सहारे टिक कर बरबस ही उसे देख रहा था।

ऐसा नहीं था की उससे खूबसूरत लड़की मैंने देखि नहीं थी , पर कुछ था उसमे जिससे मेरी नजरे उस पर रुक सी गयी थी.
उसकी आँखे दो पल को मेरी तरफ उठी , और मैंने शायद जिंदगी में उस दिन पहली बार कुछ ऐसा अनुभव किया जो इससे पहले कभी नहीं हुआ।

मुझे ऐसा लगा की जैसे किसी ने बिना मेरी इजाजत लिए मेरे अंदर कुछ पढ़ लिया हो , मैं उस दिन  पहले तक बहुत खुश था  उस दो पल की नजर के बाद से मन में एक बड़ी अजीब सी बेचैनी पैदा हो गयी ।

कभी लगता की जोर से ख़ुशी से चिल्लाऊं, तो कभी एक अजीब सा  डर सताता । दोनों ही हालातो में दिल का सुकून छीन गया था ।
घर आया तो लेट गया , आज खेलने भी नहीं गया ,बार बार अपने दिन को रिवाइंड कर के उस जगह पे ले गया जब उसकी वो भूरी आँखे दो पल के लिए मुझसे मिली थी ।
क्या वो भी मेरे बारे, में सोच रही होगी?      
पर उसकी निगाहे अगर आम होती तो ये बेचैनी सी  क्यूँ होत्ती , कुछ तो था , हमारे बीच, जो हमें जोड़ता था ।

 उस दिन के बाद से मैं बदल गया था , वो मेरे ही क्लास में आयी थी , हमेशा हँसते खेलते रहने वाला मैं अब चुप रहने लगा था
शायद आप जिसे पसंद करते हो उसके सामने आप जल्दी खुल नहीं पाते ।

उस समय लड़की और लड़के अलग बैठते थे, वो हमेशा लड़कियो की दूसरी  लाइन में बैठती  और मैं कोशिश करता की मैं लड़को में उससे एक लाइन पीछे बैठूं यानी की तीसरी लाइन , तकी बिना नजर में आये  मैं उसे देख सकूँ !
उधर वो पढाई में लगती,और इधर मैं उसे देखने में , मैं हमेशा ये कोशिश  करता की उसे ये पता न लगे की मैं  उसे देखता हूँ !

दोस्तों ने बताया की पापा एयरफोर्स में है, अभी ट्रांसफर हुआ है ! तो  यहां एडमिशन करा दिया  है|
सुन  के  अच्छा लगा , बस अब अपनी हालात समझदार मजनू जैसी हो गयी थी ।
समझदार मजनू वो होता है जो हालात  से एकदम आशिक हो चूका हो , पर किसी को दिखाता नहीं है

शनिवार का दिन हमेशा मेरे लिए खास होता, क्योंकि शनिवार को जब वह वाइट स्कर्ट और ब्लू स्वेटर में अपने बालो में सफ़ेद hairband  लगा के आती, तो उसके चेहरे  और आँखों का रंग और उभर आता था |

हमारी हालात उस लड़के की तरह हो गयी थी जिसे लड़की तो बहुत पसंद होती हैं , पर ये भी पता होता है की जिस दिन बात कर ली , कहानी उसी दिन ख़तम है!

खैर ऐसे ही चोरी छिपे दिन बिताते जा रहे थे , उस समय मोबाइल तो थे नहीं , तो उससे बात करने का मौका और समय सिर्फ स्कूल में ही मिल सकता था।
पर हिम्मत थी जो उठ नहीं रही थी और समय था जो रुक नहीं रहा था , दो महीने हो चुके थे मेरी गुमनाम आशिक़ी को।

उसे देखना एक दिनचर्या हो गयी थी और उससे बात न करना एक आदत ।
एक दिन अपनी क्लास के बहार खड़ा था , खड़ा क्या उसे देखने के बहाने से बाहर आया था , वो मेरे दोस्तों के साथ बाते कर रही थी और मैं उनके थोड़ा पीछे खड़ा होक बस उसके पास होने में ही सुख ढूंढ रह था ।

अचानक उसने मेरी तरफ देख के पूछा

"वो जियोग्राफी का होमवर्क कर लिया ? "

हम क्या बोलते ,हमारी तो जियोग्राफी , हिस्ट्री ,सिविक्स सब एक हो गया था उस वक़्त ,

बमुश्किल मुंह से निकला
"नहीं , कल करूंगा"
"और तुम्हारा ?"

उसने क्या बोला मैंने सुना  नहीं , मैं तो बस कहीं खो गया था !
ऐसा लगा की वो लम्हा रुक गया हों कहीं ।

उस दिन के बाद से मैंने अनुभव किया की वो भी मुझे कभी न कभी देखती  है , शायद वो अनुपात 10 में से 1 का ही क्यों न हो, पर था  जरूर .
कभी कभी जब आँखे मिलती तो ऐसा लगता मानो कह रही हो ,की काश थोड़ी सी हिम्मत तुम्हारे अंदर और होती तो शायद हम एक दुसरे को थोड़ा और जानते , बात करते ।
खैर दिन बीतते गए , कल से गर्मी की छुट्टियां हैं  दो महीने , मन उदास था , अब दो महीनो तक उससे मुलाक़ात नहीं हो पायेगी , मन भारी  था ,हवा भी रूखी और उदास सी लग रही थी और आज शनिवार भी था ,
आज उसके रुखे भूरे गाल और चमकती हल्की भूरी आँखे मन को भेद रही थी |  मानो कह रही हों की क्या आज भी बात नहीं करोगे ?

मन उदास हो तो कुछ भी सही नहीं लगता , आज मैं क्लास में सबसे पीछे बैठा था  , न किसी से बोला कुछ , और न ही उससे कोई बात हुई , दिन निकल गया और छुट्टी हो गयी  ! मैं उसे एक कोने में खड़े होकर बस की तरफ जाते देखने लगा ,इस उम्मीद में की शायद वो एक बार पलट के देख ले

पर ,  लड़कियां सिर्फ फिल्मो में पलटती हैं , असल जिंदगी  में नहीं  |

आज ठीक वैसा ही बुरा लग रहा था , जितना पहले  दिन असम  आ के लगा था , खाली एकदम  अंदर से |
पता नहीं लोग आते क्यों हैं जिंदगी में ?
3,4 दिन लग गए मुझे सामान्य होने में  , फिर मैं भी गांव आ गया  छुट्टियों में , गांव के हरे भरे खेतो ने और आम के बगीचों ने मेरे अंदर के खालीपन को कुछ हद तक भर दिया था ।

पेड़ पे घण्टो चढ़े रहना  ,क्रिकेट खेलना , रात में चचेरे भाई बहनो के साथ छत पर अंताक्षरी और  मौजमस्ती , और अगले दिन फिर से यही सब ।

खैर समय रुकता नहीं, छुट्टियां ख़तम होने को थी  , जाने का समय हो रहा था  , लेकिन मन फिर भारी था , कुछ समय के लिए ही सही मैं फिर से वही अलमस्त लड़का  हो गया था ! कविता नहीं थी तो कोई दर्द ,उम्मीद ,डर भी नहीं था  ,
उसके आने से एक परिपक़्वता आ गयी थी
खैर उसे देख लेने भर से जो मन को सुकून मिलता था उसकी कोई तुलना नहीं थी  .
ट्रेन में चढ़ा तो उसे फिर से मिलने की ख़ुशी थी, लेकिन गम इस बात का था ,की उम्मीद पूरी थी की पिछली बार की तरह इस बार भी हम गूंगे आशिक़ ही रहेंगे  |
खैर उसे देख भर लेने में ही सुख था ।

भाग ३ 

आँखे  डरी  सहमी सी उसके आने का इन्तिज़ार कर रहीं  थी  ! लेकिन  वो आयी नही
एक, दो, तीन, चार ..दस दिन बीत  गए , पर वो नहीं आयी  , दिल  बैठ गया ।

काश थोड़ी बात कर ली होती  , थोड़ी हिम्मत दिखा ली होती  , शायद स्कूल छोड़ गयी !छुट्टियो के बाद आर्मी और एयरफोर्स वाले कई बच्चे पापा  की पोस्टिंग होने की वजह से स्कूल छोड़ के दूसरी जगह नाम लिखा लेते हैं , मैं भी तो ऐसे ही आया था असम में !!

एक दिन इसी उधेड़ बुन  में सबसे पीछे बैठा था  , तभी एक चहकती हुई आवाज़ गुंजी
"May i come in sir !"

आँखों में जैसे बिजली कौंध गयी
नजर उठी , नजर मिली , मानो वो पूछ रही थी की और बेटा मिस किया की नहीं, और बात मत करो  !
कसम से अगर वो 2016 होता तो उसे दौड़ के गले लगा लेता , लेकिन वो साल २000 था ।
खैर उस ने घुसते साथ ही क्लास में सबसे पहले मुझे ढूंढ के देखा ,कम से कम  मैं आज तक यही सोचता हूँ ।

पीरियड ख़तम होते ही मैं दौड़ के उसके पास गया
"कैसी रही छुट्टियां ?"
 "कब आयी वापिस?" ,
 मेरे अंदर न जाने कहाँ से हिम्मत आ गयी , पिछले 6 महीनो में शायद पहली बार मैंने उससे बात की, और पूछ ऐसे रह था जैसे की बरसो से साथ हूँ ।
उसने हंस के जवाब दिए मानो  कह रही हो , मिटटी के शेर आ गए लाइन पे ।
उस दिन अचानक ही ऐसा लगा जैसे हमने एक दुसरे के मन को छु लिया हो ।

काफी दिनों बाद जो उसके न होने से मन उदास था आज उसमे खुशियो की बारिश थी  , और बहार होती बारिश ने  मन को सरोबार कर दिया था ।
उस दिन उसने बहुत बार देखा मुझे , और मैं खुश था और नर्वस भी  , नर्वस इसलिए की मुझे पता था की मैं कोई शाहरुख नहीं हूँ ,तो किसी स्मार्ट और कॉंफिडेंट लड़की का आपको इस तरह से बार बार देखना आपको नर्वस ही करेगा ।

खैर मैंने सोच लिया था की बहुत हो गया, अब अगले सोमवार को मैं हिम्मत कर के इसे बोल दूंगा  की तुम्हारे आते ही कुछ कुछ होने लगता है और ये तुम्हे समझना पड़ेगा।
संछिप्त में प्रोपोज़ करने की सोचने लगा

आज सोमवार है  ,लेकिन इस पूरे वीक मैं खुद को तैयार करूँगा अपने पहले प्रोपोज़ के लिए,जब बात करने में 6 महीने लगा दीये  तो प्रोपोज़ के लिए एक वीक में तयारी करनी बनती है ।

इस बीच मैं और वो बस एक दुसरे को बीच बीच में देखते रहते थे , उसने कई बार कोशिश की बात करने की , पर मैं अब सारी  हिम्मत जुटा के सिर्फ एक बात ही बोलना चाहता था , बीच में बात कर के मैं अपने संकल्प को कमजोर नहीं करना चाहता था ।

आज फ्राइडे है कल सेकंड सैटरडे और परसो संडे, यानी  दो दिनों की छुट्टी , बस तीन दिन बचे हैं मुझे उसे प्रोपोज़ करने के लिए  , एक अनुभवी  व्यक्ति  की तरह मैंने स्ट्रेटेजी बना रखी  थी और बड़ी अकड़ के साथ उसे इग्नोर कर रहा था ।

आज उसने मुझे फिर देखा , पर आँखों में चमक नहीं थी , एक खाली उदासी थी  , उसने मुझे देख कके स्माइल दिया  मैंने भी हलके से स्माइल किया और फिर बड़े एट्टीट्यूड के साथ ब्लैकबोर्ड की तरफ देखने लगा !
उसने भी अपनी किताब में आँखे गड़ा  ली, रोज चहकने वाली कविता आज चुप थी  , ये बात कहीं मुझे खटक रही थी लेकिन मैं तो अब मास्टर स्ट्रैटिजिस्ट था  , अब एक ही बार बात होगी मंडे को  ,उससे पहले नहीं , बड़ी मजबूती से अपने मैंने मन को समझाया ।

इंटरवल में आज वो क्लास में ही रुकी , मैं हमेशा लेट निकलता था क्लास से इंटरवल में , आज भी बस दो तीन लड़के और मैं और वो थी क्लास में
 |
मैंने निकलते हुए उसे देखा, उसने हलकी सी स्माइल दी , जो दर्द से भरी सी लगी , बढ़ते पैर  रुकना चाहते थे , लेकिन अब जो होगा मंडे को ही होगा , ये मन बना के मैं वह से तेजी से निकल गया

छुट्टी हो गयी , उसने अपना बैग उठाया और बिना मुझे देखे चुप चाप निकल गयी  , मैं हलके से उसके पीछे की तरफ आया ताकी उसे जाता हुआ  देख सकूं
आज उसकी चल भी बहुत धीमे थी , वो सर झुकाये अपनी रह चली जा रही थी  , कुछ खटक रहा था मेरे अंदर पर क्या?

मैं उसे बस देखे जा रहा था , अपने बस के पास पहुचने से ठीक पहले वो पलटी, मेरी उससे नजरी मिली  , उसकी आँखे थोड़ी भरी थी , उसने हलके से स्माइल के साथ मुझे बाय किया मेरे हाथ भी अनायास  हलके से बाय  के लिए उठ गए
कुछ अजीब था आज , पर क्या , मेरा मन, मेरा कॉन्फिडेंस ,मेरी अकड़ सब हवा हो गए  , वो पलट के गाड़ी के अंदर चली गयी ।
वो मैंने उसे आखिरी बार देखा था , मैं मंडे को पूरी तयारी के साथ आया , लेकिन मेरा मंडे कभी आया नहीं ,
जेहन में बस उसकी यादे रह गयी और उसकी आँखे रह गयी ।
उसने तक ले ली थी , फ्राइडे उसका लास्ट डे था , और मेरे न जाने कितने फ्राइडे और मंडे उसकी यादो में बह गए ।
शायद इसलिए उदास थी , शायद बताना चाहती थी  ,शायद कुछ कहना चाहती थी
आज भी उसका पहला और आखिरी दिन आँखों के सामने आ जाता है  और दिल अचानक से ही बैचैन हो जाता है । 

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