A dogs love story.
आप में से कई लोगो ने मेरी प्रजाति को पाला होगा , आप इंसानो की भाषा में हमें कुत्ता कहते हैं , पता नहीं ये शब्द इंसान इतने गुस्से और तिरस्कृत भाव से क्यों कहता है , हम तो इंसानो के सबसे अच्छे दोस्त माने जाते हैं , मेरे पूर्वजो और मेरे साथियो ने कभी भी अपने मालिको को दगा नहीं दिया , हमारी वफ़ादारी की मिसाले दी जाती हैं।
ऐसा मेरी मां ने मुझे बताया था ।
आह, कितनी सुन्दर थी मेरी माँ।
सफ़ेद, एकदम दूध की तरह, छोटा शरीर ,लेकिन हवा सी फुर्तीली , छोटी तेज चमकती आँखे , कान जो हमेशा चौकस और चौक्कने रहते थे , कितना प्यार था उसे हमसे।
हमें अपना दूध पिला के सर की नीचे दबा लेती थी , दूध पी के मोटे ताजे हो चुके हम दोनों भाई बहन जब इधर उधर लुढकते थे तो उसकी आँखे प्यार से हमें देखा करती थी ,सर्द और डरावनी रातो में हमें अपने पास दुबका के सुला लेती थी ।
मैं थोड़ा स्वभाव से नटखट था , जरा भी मैं इधर उधर होता या उसे खतरे का आभास होता तो वो अपने दोनों कान खड़े कर के मुस्तैद होके मेरे सामने खड़ी हो जाती थी ,और मैं हर बातो से अनजान लुढ़कता पुढ़कता फिर से दूध पीने के लिए उसके पैरो के पास लपकता ! वो प्यार से मुझे चाटती थी ।
मां , कितना सकूं था तेरे स्पर्श में
आज भी तेरी याद आती है मां ।
एक दिन दो लोग आये , मुझे और मेरी बहन को अपने साथ ले आये।
मां , कहाँ है तू?
मैं कितना तड़पा और छटपटाया था , तेरा वो स्पर्श ,तेरे सफ़ेद मखमली बाल ,जिसमे छुप के मैं खुद को कितना महफूज पाता था, मां ऐसा कुछ भी नहीं है मेरे पास , मखमली गद्दे तो हैं ,पर उसमे मान का प्यार और पुचकार कहाँ से डालूँ ।
ये कटोरे में रखा दूध माँ , बिलकुल अच्छा नहीं लगता ।
मुझे एक परिवार ने अपना हिस्सा बना लिया था , मैं धीरे धीरे सबसे घुल मिल गया था , बिस्तरे में सोता था ,हाथ से खाना खिलाया जाता ,नहाना मुझे बहुत पसंद था, खासकर गर्मियो में , इसलिए जब नहाने की बारी आती , गार्डन में कुर्सी लगाई जाती जिसमे मैं चढ़ के दोनों पवन कुर्सी की पीठ टिकाने वाली जगह रख कर, मैं आराम से नहाता था ।
शायद ये वो जिंदगी नहीं है ,जिसे कुत्ते की जिंदगी कहा जाता है ।
यहां मुझे सब "Cola" बुलाते हैं
काश मेरी बहन भी उतनी ही खुश होती जितना मैं था|
मेरे पड़ोस वाले घर में ही आयी थी , दोनों घर की बनवाट एक जैसी थी , घर के आगे पीछे बड़े बड़े मैदान थे ,दोनों घर एक दुसरे से सटे हुए थे ,उस लाइन में और भी बड़े सारे घर थे ,
हम दोनों की घर की बनवाट एकदम एक जैसी थी ।
घर में घुसने के साथ ही पहला कमरा था ,जिसमे बड़ी सारी लकड़ी की चीजे थी ,अक्सर मिलने जुलने वाले नए लोग यहीं आके बैठते , इस कमरे को पार करते ही दूसरा कमरा था जहाँ एक बड़ा सा लकड़ी का पलंग था , जिसपे सब सोते थे ।
दूसरा कमरा पार करते ही , एक छोटा सा बरामदा था , जिसके बाद गार्डन शुरू हो जाता था
एक पतली सी दिवार थी जो हम दोनों घर के बरामदों को अलग करती थी ।
उसके मालिक शायद इतना ध्यान नहीं रखते थे उसका , तभी तो कितनी कमजोर हो गयी थी।
उसका पेट कितना चिपका हुआ था , जैसे की कुछ खाया न हो ।
हालांकि उसकी आँखे तेज और चमकदार थी , एकदम माँ पे गयी थी ।
मैं उसके साथ मिलना चाहता था , खेलना चाहता था , जैसे ही दरवाजा खुलता मैं दौड़ के उनके दरवाजे के पास पहुँच जाता , कूँ कूँ कर के मैं कितनी कोशिश करता की वो लोग भी दरवाजा खोल दे ,लेकिन थक हार कर मेरे घर वाले मुझे अपने पास ले जाते थे , सिर्फ मेरे कूँ कूँ के जवाब में दरवाजो के पीछे से एक तड़पती हुई आवाज और शरीर की गंध महसूस होती॥
क्या इंसान अपने बच्चो के साथ भी ऐसा बर्ताव करते हैं , हम भी तो बच्चे ही है , पर अफ़सोस इंसान के नहीं॥
शायद इंसानीयत , इंसान और जानवर को अलग अलग देखती है, हम बेजुबानो की तड़प सिर्फ हम तक रह जाती है॥
फिर हम दोनों थकहार के बरामदे के उस हिस्से में आ जाते जहाँ हमारे बीच सिर्फ एक दीवार होती थी , मैं उसके पंजो की आवाज़ सुनता जिसे वो दीवार में धीरे धीरे मारती थी , हम दोनों वही पड़े रहते , एक दुसरे के इतने पास बस एक दीवार से दूर॥
इंतिजार रहता तो बस शाम का , जब उसका दरवाजा खुलता, और वो दौड़ते हुए मेरे पास आती , कई बार जल्दी बाजे में कुर्सी से लड़ जाती थी , मानो उसके पास समय बहुत कम हो , आते ही मुझे तब तक चाटती रहती जब तक थक नहीं जाती।
मेरे लिए ये दिन का सबसे अच्छा समय होता था , फिर हम दोनों एक लंबी दौड़ लगाते खुले मैदान की तरफ।
वो बहुत जल्दी थक जाती थी , पेट अभी भी बहुत पिचका हुआ है , मैं उसे चाटता , वो अपना सर मेरे सर के ऊपर रख के सो जाती , फिर हम दोनों वहीं लेटे लेटे मां के बारे में सोचते॥
ठण्ड का मौसम था , मैं बार बार बाहर दरवाजे से जा के देख रह था की शाम हुई है की नहीं , थोड़ी देर बाद मैं फिर दौड़ के बाहर की तरफ गया , देखा तो वो सफ़ेद दूध सी हरी घास में लेटी हुई थी।
पर वो आज मेरे पास आयी क्यों नहीं ?
मैं दौड़ता दौड़ता ख़ुशी के मरे उसके पास पहुंचा , उसे चाटना शुरू किया , पर ये हिल क्यों नहीं रही ?
उसकी सुन्दर आँखे यूँ आस्मां में क्या देख रही थी ?
आसपास उसके सबलोग चुप छाप क्यों खड़े थे ?
आज उसका सफ़ेद शरीर हरी घास में शिथिल पड़ा हुआ है ।
शायद इसलिए इतनी जल्दी में रहती थी ,समय कम था , सब मुझ पे उड़ेल देना चाहती थी ।
मां का प्यार ,दोस्त का प्यार, सब जैसे न्योछावर कर देना चाहती हो , शायद जैसे माँ ने सीखा के भेजा था की इसका ख्याल रखना ॥
वो चली गयी , अब दरवाजो के पीछे से कोई कूँ कूँ की आवाज़ नहीं आती , दीवारों पर कोई अपने पंजे नहीं खुरचता
दिन तो मेरा अब भी कट जाता है , पर दोपहरी नहीं कटती , जब सब खा के सो जाते हैं , तो मैं उसी बरामदे की दीवार की तरफ जा के लेट जाता हूँ और उसके होने की आस में आँखे मूँद लेता हूँ ॥

Ek number ... !!
ReplyDeleteउत्तम, एक बेजुबान की भावनाओं को ठीक से चित्रित किया, एक दम उम्मदा कहानी है
ReplyDeleteNyc bro
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